Navratri 2025: शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन मां दुर्गा के एक अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मांड में चारों ओर अंधकार छाया हुआ था और कहीं जीवन का कोई अस्तित्व नहीं था, तब मां दुर्गा ने अपने कूष्मांडा स्वरूप में हल्की मुस्कान भरते ही ब्रह्मांड की रचना कर दी।
‘कूष्मांडा’ शब्द दो भागों से बना है –
- कूष्म : ऊर्जा या ऊष्मा
- अंडा : ब्रह्मांडीय गोला
यानी वह देवी, जिनकी शक्ति से पूरे ब्रह्मांड की रचना हुई। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदि शक्ति और ब्रह्मांड की जननी माना जाता है।
सूर्य और ऊर्जा की देवी
माना जाता है कि पूरे ब्रह्मांड में जितनी भी ऊर्जा और प्रकाश है, वह सब मां कूष्मांडा की ही देन है। यहां तक कि सूर्य का तेज भी उनके ही आशीर्वाद से है। इसीलिए उन्हें सौरमंडल की देवी भी कहा जाता है।
उनकी पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में नई शुरुआत करने की शक्ति और आत्मविश्वास मिलता है।
मां कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप
- मां कूष्मांडा का स्वरूप तेजस्वी और अत्यंत दिव्य है।
- उनकी आठ भुजाएं हैं।
- हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा जैसे शस्त्र धारण किए हुए हैं।
- उनके हाथों में स्थित अमृत कलश भक्तों को निरोगी और दीर्घायु जीवन का आशीर्वाद देने का प्रतीक है।
- उनका वाहन सिंह है, जो साहस और शक्ति का प्रतीक है।
पूजा विधि और महत्व
- चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा में हरे रंग का विशेष महत्व होता है। भक्त इस दिन हरे रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करते हैं।
- मां को मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है, क्योंकि यह उन्हें बहुत प्रिय है।
- इस दिन की पूजा से रोगों से मुक्ति मिलती है, जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है, स्वास्थ्य, धन और शक्ति की प्राप्ति होती है।
पूजा का संदेश
मां कूष्मांडा की पूजा हमें यह सीख देती है कि हर इंसान के भीतर अपार शक्ति छिपी होती है। अगर हम अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं, तो जीवन में किसी भी कठिनाई का सामना कर सकते हैं और एक नई शुरुआत कर सकते हैं।